पीएम मोदी ने 10,000 जन औषधि केंद्र खोलकर जनता को सस्ती दवा का लाभ दिलाया - रवि तिवारी (Ravi Tiwari)

Ravi Tiwari, BJP leader in Delhi: देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने देश भर में 10,000 जन औषधि केंद्र खोल दिए हैं। 30 नवंबर, 2023 को मोदी जी ने दस हजारवें औषधि केंद्र का उद्घाटन किया। पीएम का लक्ष्य था कि मार्च 2024 तक देश भर में जन औषधि केंद्रों की संख्या को दस हजार तक पहुंचा दिया जाय। जो कि उन्होंने समय से पहले से पूरा कर दिया।

 

हम भारतीयों को तो यह आदत है कि कोई सरकारी योजना अपने नियत समय के सालों बाद भी पूरी हो जाये तो बहुत बड़ी बात है। लेकिन यहाँ मोदी जी और उनकी टीम के प्रयासों की बदौलत समय से पहले ही लक्ष्य को हासिल कर लिया गया है। यह बदलते और उभरते हुए भारत की एक नायाब तस्वीर है। यह दर्शाता है कि भारत निरंतर विकास और प्रगति के पथ पर अवसर है।

क्या है जन औषधि केंद्र?

 

इस ब्लॉग के माध्यम से रवि तिवारी (Ravi Tiwari) जी आपको बताना चाहते हैं कि आखिर जन औषधि केंद्र है क्या? प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र गरीबों को समर्पित एक योजना है जिसके माध्यम से अब आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को महँगी दवाओं के मकड़जाल से राहत मिली है।

 

यहाँ पर आपको जेनेरिक दवाएं मिलती है जो कि बाजार की ब्रांडेड दवाओं से लगभग 50 से 90 फीसदी तक सस्ती होती हैं। किसी भी असाध्य रोग से ग्रसित मरीज के लिए बाजार से दवाएं खरीदना लगभग नामुमकिन होता है। लेकिन फिर भी इंसान मजबूरी में खरीदता है क्योंकि जान का प्रश्न है।

 

बाजार में मिलने वाली दवाएं ब्रांडेड होती हैं जबकि यहाँ मिलने वाली दवाएं जेनेरिक होती हैं। दोनों ही किस्म की दवाओं का फार्मूला एवं साल्ट एक होता है। औषधि केंद्र की दवाएं भी उतनी ही कारगर होती हैं जितनी कि ब्रांडेड।

सस्ती क्यों होती हैं जन औषधि केंद्र की दवाएं?

 

अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र की दवाएँ इतनी सस्ती क्यों होती हैं? क्या इनमें कोई मिलावट होती है या फिर यह दवाएं कारगर नहीं होती हैं? इतना संदेह हमारे मन में पैदा कर दिया गया है कि हम जन औषधि केंद्र की सस्ती दवाओं को छोड़कर बाजार की महँगी ब्रांडेड दवाओं के चक्कर में अपनी जेब ढीली कर लेते हैं।

 

जन औषधि केंद्र की दवाओं के सस्ती होने का कारण इनकी गुणवत्ता में कमी कतई नहीं है। इनके प्रचार-प्रसार पर पैसा नहीं खर्च किया जाता है। इन कंपनियों का पेटेंट नहीं होता है ये जेनेरिक दवाएँ होती हैं। इन्हे रिसर्च डेवलपमेंट पर भी खर्च नहीं करना पड़ता है।

 

किसी ब्रांडेड कंपनी के द्वारा खोजे गए फॉर्मूले पर ही यह दवाएं बनाते हैं। इनका सारा खर्च सिर्फ प्रोडक्शन और पैकिंग का आता है। इन दवाओं की पैकिंग भी काफी साधारण होती है। जिससे इनकी कीमतों में वृद्धि नहीं हो पाती है। इनके डिस्ट्रीब्यूटर्स को भी अपेक्षाकृत कम मुनाफा होता है।

 

इन सभी कारणों के चलते इन दवाओं की कीमतों में भारी कमी हो जाती है। जबकि इनकी गुणवत्ता में कोई कमी नहीं होती है। यह दवाएं भी ब्रांडेड और पेटेंट दवाओं जितनी ही असरदायक होती हैं। पूरे देश भर में दस हजार जन औषधि केंद्र से लाखों-करोंड़ो की संख्या में मरीज लाभान्वित हो रहे हैं।